शनिवार मई 19 , 2012
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न सरोकार के साथ - साथ व्यवसायिक जगत की ओर हमारी ये उडान शेयर बाजार की हलचल, सिक्के की खनक, मुद्रा का मुखडा, खेत - खलिहान से मंडी और बाजार तक की उन छोटी - छोटी जानकारी से लेकर वे तमाम सुचनाये जो आयात और निर्यात को बढावा देने का काम करती है वे सभी बाते भले ही छोटी हो, लेकिन अर्थव्यवस्थ के परिधि में वे बड़े काम की होती है।

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लबादा न कवच ... एक अखबार ... बाजार में

विशेष सम्पादकीय :- रविकांत
संपादक हमर छत्तीसगढ़.कॉम

          बाजार जितना तकलीफ  दायक शब्द है उससे अधिक बाजार में उतरकर तमाम दुविधाओं के साथ सुविधाओं को अँजुरी में बटोरने के लिए एक - एक क्षण को जीना कष्टकारी है नदी की जलधारा में नख की जो स्थिति तूफान को झेलते हुए होती है उसके लिए पहले से किये गए जतन काम नहीं आते समय जो समस्या उपजाता है उसका हल भी वही होता है। उसे अन्यत्र खोजना नाहक ही सिद्ध होता है। पहले मासिक और अब हर शाम(सांध्य अख़बार )....।

                            संवेदना, समस्या, उत्साह और तमाम सुखद-दुखद अनुभव जो खबर का आकार ग्रहण करती हैं वे सारी चीजें पन्ने में मौजूद होगी, देश विदेश का हाल-चाल भी। विचार और सरोकार के साथ व्यापार खेल के भी अंश अखबार के मायने बाजार के सामने सही अर्थ में ध्वनित हो इसका हम पूरा प्रयास करेंगे। आजादी के पहले अखबार का अर्थ था- अगर तोप मुकाबिल हो तो ...। जाहिर हमारा दुश्मन चिन्हित था। पन्नों पर आक्रोश, जागृत की भावना उफनाती थी। बाजार ने वही ही बदला तो बस 'कबिर होने के अर्थ को।

                                 हाँलाकि बाजार के बगैर 'कबिर  होने का भाव भी अपना अर्थ सही ढंग से नहीं रख पाता। ढ़ेर सारे हमारे शुभचिंतको ने अखबार के कलेवर को लेकर अपनी राय दी है। मुप्त की सलाह....। कुछ अभी भी हमारा हौसला बुलंद कर रहे हैं, उम्मीद है वे आगे भी करते रहेंगे। ऐसे ही कई नाम हैं। अखबार के हर मानक पूरे हो यह भरोसा अपने पाठकों को इसके साथ दे सकते है कि छत्तीगसढ़ के जज्बात को उभारना हमारी पहली प्राथमिकता है।
    गति के साथ पाठक हमारे बहाव को संघ बनाए रखेंगे यह भी अपेक्षा है। दिल्ली की वरिष्ठ पत्रकारों ...... के अलावा देश के दूसरे हिस्से में बेहतर संसार के निर्माण के लिए और सच को सामने लाकर विकासपरक सोच को लेकर समन्वित प्रयास कर रहे पत्रकारों उनकी लेखनी का भी सान्निध्य पाठकों को सुलभ अखबार का रंग - रूप असल में पाठक ही तय करते है कि वह सही नजर आ रहा है या नहीं। विकसित होते राज्य में अखबार का बाजार में आना तय ठीक वैसे ही जैसे कि पाठक को अब ग्राहक माना जाने लगा है ... शायद गुणी ग्राहक । पाठक अब होशियार है। तभी अखबार में नित नए परिवर्तन हो रहे है। खबर लिखने में तकनीक ने सबसे ज्यादा हस्तक्षेप किया है। तीज -त्यौहार में अखबार का चेहरा अब भर जाता हैँ अखबार में खबर पूरी विश्वसनियता के साथ हो यह हमारी वचनबद्धता  होगी । अंतिम तक हम अखबार को बस अखबार ही रहने देने के लिए जद्दो-जेहद करेंगे। मंच प्रपंच निर्मित करने के मुगालते से हम कोसो दूर हैं।
    बदलते जमाने में अखबार पर बहुत सारी बातें होती है। अखबार को लेकर उससे भी कई गुणा बाते बोलती है । सारा कुछ समेट कर हम पाठक को उसके काम की सामग्री देने के लिए हर पल साथ देने के वादे के साथ जुड़े शुचिन्तक जिनकी कद-काठी, काया-माया हम वर्णित नहीं कर सकते हैं उन सभी के सहयोग के प्रति हमारा आभार। आज से कल का हमारा प्रयास जो अखबार के कलेवर में है उसके सही मूल्याँकनकर्ता पाठाक ही है ।
                                मासिक पत्रिका के तौर पर जब हम संघर्ष की राह पर थे उस वक्त हमसे जुड़े सुदूर क्षेत्रों में काम कर रहे साथियों का आग्रह था कि समाचार की प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि इसे दैनिक का स्वरूप प्रदान किया जाए । योजनाएं और समीकरण खुद बनने लगे लेकिन हम यह नहीं चाहते थे कि जल्दबाजी में अखबार निकाला जाए। सरगुजा, बस्तर, धमतरी, राजिम, दुर्ग, बिलासपुर, रायपुर, दंतेवाड़ा के क्षेत्रों के दौरे के दौरान हमने यह भी महसूस किया कि राह इतनी आसान नहीं है। कई तरह के दुखद अनुभव भी सामने आए तो अपनों ने ही यह कहा कि यह कोई हँसी खेल नहीं है। अखबार  को लेकर इस जगत के वरिष्ठ जनों से चर्चा के वक्त यह निष्कर्ष भी निकला कि पाठक की पसंदगी और पन्ने को देखकर संपादक की उभरती चाहत के बीच समन्वय बना पाना काफी कठिन है। वरिष्ठ पत्रकार राजनारायण मिश्र जो वरिष्ठता की हद पार कर चुकने के बाद भी दिलो दिमाग से जवान हैं उन्होंने हमारी राह को थोड़ा आसान जरूर किया पर पूरी दुनिया में अखबार के बारे में हो रही चर्चा पर वे इस बात का समाधान बता पाने में संशकित ही नजर आए कि 'क्या अखबार सूचनाओं का जखीरा है या वैचारिक कागजी पुलिंदा ? काफी वैचारिक बहस और आंचलिक प्रतिनिधियों के दम पर हमने अखबार को बाजार में लाने के  लिए इस भाव से तैयार हुए कि यह बाजार के बीच में खड़े आम आदमी को ताकत देने के लिए एक ऊर्जावान स्तंभ के रूप में स्थापित होगा। सपने बहुत सारे..... इसके अलावा भी हमारे पास उन लोगों के सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी है जिनकी पहुच से सरकार कोसो दूर है। सरकार उन तक नहीं पहुच पाती या वे गांव- टोले से निकलकर सरकार तक नहीं पहुच पाते। सरकार से गलबंहिया करने की बात तो छोड ही दीजिए --। सरकार हर जगह है, जब हम ऐसा कहते और मानते है तब प्रदेश के डीजीपी विश्वरंजन की साहब हर जगह है , कविता जुबान पर चढ़ जाती है। अखबारी सरोकार से वास्ता होते हुए हमारा भी वास्ता उन्हीं लोगों से हमेशा पड़ता रहता है जिनके लिए किसी को धकियाना आम बात है या फिर धकियाने को ही वे अपना अधिकार मानते है। हमने उसी तरह का साहस बटोरा है जिस तरह का साहस सरकार के सामने एक आम आदमी सच बोलने का रखता है। न तो हम सरकार के सहचर है और न ही सरकार के समानान्तर हैं, जनता के निकट जरूर हैं। आम आदमी की हमसे जो भी अपेक्षा होगी उसे हम अखबार के जरिए पूरा करने का हर संभव प्रयास करेंगे। आदर्श की पराकाष्ठा को पार करने की महत्वकांक्षा से हम परे हैं। सीधे तौर पर साफ  सुथरे चौखट बनाने के हम आकांक्षी हैं। प्रदेश के सुदूर अंचल की भी खबरें पन्ने में महत्वपूर्ण तरीके से होंगी भले ही देश-विदेश की वे बातें छूट जाएं जिन पर एक बहुत बड़ा वर्ग  बहस में लगा है

-- इति समाप्तम् --

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रवीन्द्र Ravindra अहार